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कश्मीर के चर्चित अलगाववादी शब्बीर शाह को सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिलने पर बढ़ी चर्चा

Satyakhabarindia

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कश्मीरी अलगाववादी नेता शब्बीर अहमद शाह को जमानत दे दी। यह फैसला जम्मू कश्मीर से जुड़े टेरर फंडिंग मामले में आया है। अदालत ने कहा कि शाह को जमानत दी जा रही है और विस्तृत आदेश जल्द जारी किया जाएगा। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जमानत कुछ शर्तों के साथ होगी जिनका पूरा विवरण आदेश में दिया जाएगा। राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानी एनआईए ने शब्बीर शाह पर आरोप लगाया था कि वे आतंकवादी गतिविधियों के लिए फंडिंग जुटाने में शामिल थे। इस मामले को लेकर लंबे समय से कानूनी प्रक्रिया चल रही थी और अब सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद राजनीतिक और सुरक्षा हलकों में नई चर्चा शुरू हो गई है।

अनंतनाग के व्यापारी परिवार में हुआ था जन्म

शब्बीर अहमद शाह का जन्म 14 जून 1953 को दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग जिले के कादीपोरा गांव में एक व्यापारी परिवार में हुआ था। उनके पिता गुलाम मोहम्मद वरियर ब्लॉक डेवलपमेंट ऑफिसर थे। वर्ष 1989 में पुलिस हिरासत के दौरान उनकी मौत हो गई थी। शब्बीर शाह की राजनीतिक यात्रा बहुत कम उम्र में ही शुरू हो गई थी। वर्ष 1968 में जब वह केवल 14 वर्ष के थे तब उन्होंने भारत सरकार के खिलाफ एक प्रदर्शन का नेतृत्व किया। इस प्रदर्शन के बाद उन्हें गिरफ्तार किया गया और करीब तीन महीने जेल में रहना पड़ा। बाद में उन्होंने अपने साथियों के साथ यंग मेन लीग नामक संगठन बनाया। हालांकि लगातार गिरफ्तारियों और राजनीतिक गतिविधियों के कारण उनकी पढ़ाई पूरी नहीं हो सकी।

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जेल में अलगाववादी नेताओं के संपर्क में आए

शब्बीर शाह की राजनीतिक सोच और सक्रियता का एक बड़ा हिस्सा जेल के अनुभवों से जुड़ा रहा। श्रीनगर की सेंट्रल जेल में रहने के दौरान वह कई अलगाववादी नेताओं के संपर्क में आए। वर्ष 1974 में उनके साथियों ने जम्मू कश्मीर पीपुल्स लीग का गठन किया। इसके बाद वर्ष 1998 में शब्बीर शाह ने जम्मू कश्मीर डेमोक्रेटिक फ्रीडम पार्टी की स्थापना की। वह लंबे समय तक विभिन्न आंदोलनों और राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय रहे। 1968 से लेकर कई दशकों तक उन्हें कई बार गिरफ्तार किया गया या नजरबंद रखा गया। अलग अलग कानूनों के तहत उन्हें हिरासत में लिया गया और कई बार उन्हें लंबे समय तक जेल में रहना पड़ा।

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लंबा राजनीतिक संघर्ष और विवादों से जुड़ी यात्रा

शब्बीर शाह का नाम जम्मू कश्मीर की राजनीति में लंबे समय से चर्चा में रहा है। वर्ष 1975 में इंदिरा गांधी और शेख अब्दुल्ला के बीच हुए समझौते का विरोध करने पर भी उन्हें जेल भेजा गया था। 1988 और 1989 के दौरान वह कुछ समय तक भूमिगत भी रहे लेकिन बाद में 1989 में गिरफ्तार कर लिए गए। बाद के वर्षों में भी उनकी राजनीतिक गतिविधियों को लेकर कई विवाद सामने आते रहे। वर्ष 2017 में उन्होंने सैयद अली शाह गिलानी के नेतृत्व वाली तहरीक ए हुर्रियत से सचिव पद से इस्तीफा दे दिया था। अब सुप्रीम कोर्ट से मिली जमानत के बाद एक बार फिर उनका नाम सुर्खियों में है और यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आगे इस मामले में कानूनी प्रक्रिया किस दिशा में बढ़ती है।

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